विज्ञापन

ग़ज़ल - कसौटी पे कभी कसते नहीं बस ठान बैठे है

Satish Borkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कसौटी पे कभी कसते नहीं बस ठान बैठे है
        
                                                    
                            
किताबों में लिखा है जो उसे सच मान बैठे है

हमें भी बुद्ध होना है यही प्रण ले कई भिकखू
किसी पीपल तले देखो, लगा कर ध्यान बैठे है

गुलामी तब भी करते थे गुलामी अब भी करते हैं
कई इतिहास से अपने यहाँ अनजान बैठे है

न उलझन है न कोई बात है अब दरमियाँ बाकी
हम उनकी और हमारी वो हकीकत जान बैठे है

किसी की बात बेमतलब हो और सुनना हो मजबूरी
तो ऐसे ढोग कर लो यारों जैसे कान बैठे है
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all