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ग़ज़ल - कसौटी पे कभी कसते नहीं बस ठान बैठे है

                
                                                         
                            कसौटी पे कभी कसते नहीं बस ठान बैठे है
                                                                 
                            
किताबों में लिखा है जो उसे सच मान बैठे है

हमें भी बुद्ध होना है यही प्रण ले कई भिकखू
किसी पीपल तले देखो, लगा कर ध्यान बैठे है

गुलामी तब भी करते थे गुलामी अब भी करते हैं
कई इतिहास से अपने यहाँ अनजान बैठे है

न उलझन है न कोई बात है अब दरमियाँ बाकी
हम उनकी और हमारी वो हकीकत जान बैठे है

किसी की बात बेमतलब हो और सुनना हो मजबूरी
तो ऐसे ढोग कर लो यारों जैसे कान बैठे है
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3 महीने पहले

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