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अना सवार थी सर पर या कुछ ख़ुमारी थी

Satish Borkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अना सवार थी सर पर या कुछ ख़ुमारी थी
        
                                                    
                            
बड़े तपाक से तस्वीर तेरी फाड़ी थी

तबाह जिसने किया उससे क्या गिला करता
कभी उसी ने मेरी ज़िन्दगी सँवारी थी

किसी किताब के पन्ने में खो गयी थी जो
सहेज कर थी रखी चिट्ठी वो तुम्हारी थी

खुली सड़क पे किसी पेड़ के तले बैठे
वो बाँहों में कई घंटों तलक हमारी थी

सतीश दिल से वो निकला नहीं गया दिन ढल
तमाम रात जिसे सोचते गुजारी थी
- सतीश बोरकर
4 घंटे पहले
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