अना सवार थी सर पर या कुछ ख़ुमारी थी
बड़े तपाक से तस्वीर तेरी फाड़ी थी
तबाह जिसने किया उससे क्या गिला करता
कभी उसी ने मेरी ज़िन्दगी सँवारी थी
किसी किताब के पन्ने में खो गयी थी जो
सहेज कर थी रखी चिट्ठी वो तुम्हारी थी
खुली सड़क पे किसी पेड़ के तले बैठे
वो बाँहों में कई घंटों तलक हमारी थी
सतीश दिल से वो निकला नहीं गया दिन ढल
तमाम रात जिसे सोचते गुजारी थी
- सतीश बोरकर
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