गरीबी का यह कहर, हर एक परिवार पर भारी है,
इसने छीनी खुशियां सबकी, कैसी यह लाचारी है।
चूल्हा ठंडा, रातें सूनी, सिसक रही हर सांस यहाँ,
रोटी की एक आस में देखो, भटक रहा इंसान यहाँ।
कोई मजबूरी का मारा, किस्मत से ही हार गया,
कोई अपनी ही गलती से, दलदल में है उतर गया।
बचपन का वो खेल-खिलौना, काम की भेंट चढ़ जाता है,
नन्ही सी इन आँखों में, बस आंसू ही रह जाता है।
महलों की इस दुनिया में, झोपड़ी खड़ी बेहाल यहाँ,
भूख से व्याकुल बच्चों का, कौन सुनेगा हाल यहाँ।
दिन भर करता जो मजदूरी, रात को भूखा सोता है,
छत टपकती बारिश में, पर चुपके-चुपके रोता है।
पैसे की इस अंधी दौड़ में, इंसानियत भी सोई है,
गरीब के इस कड़वे सच पर, आँख न अपनी रोई है।
पर हिम्मत की तरवार थामकर, लहरों से लड़ना होगा,
अंधियारे को चीर के हमको, आगे ही बढ़ना होगा।
मेहनत की स्याही से अपनी, नई कहानी लिखेंगे,
गलतियों को सुधार कर हम, अब जीना सीखेंगे।
टूटेगा यह चक्र गरीबी का, फिर से खुशियां आएँगी,
मेहनत की इस पावन धूप में, कलियाँ फिर खिल जाएँगी।
-: सार्थक पियुष सिंह