फुरसत ही नही रही उसे कभी अपने सपनो के लिए
भागता रहा जीवन भर वह अपनो के लिए
जरूरतों ने कभी दो पल सुकून के दिए ही नही
कभी मिला मौका सुख का तो भी उसने लिए ही नही
बस एक आस में मजदूर बन खटता रहा है वो
करेगा साध पूरी सपने बस बुनता रहा है वो
कभी दो पल उसके भाग्य में खुशियों के आएंगे
खबर क्या थी कि उसके लाडले घर छोड़ जाएंगे
उमर की शाम में भी कितना ज्यादा काम करता है
पिता अपनी उदासी का भी ये अंजाम करता है
सरोज सरु
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