विज्ञापन

लता लिपट के जो कानों में कह गयी तरु के

Saroj Yadav

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            लता लिपट के जो कानों में कह गयी तरु के
        
                                                    
                            
वो झूम यूँ गया जैसे बहार आई हो
खुशी को जिसने भी देखा समझ गया खुद ही
मयूर के लिए जैसे कि घटा छाई हो
जिधर भी देखिए मौसम भी मेहरबान हुआ
चमकते जुगनू की जैसे बरात आई हो
ये बाग़ देखिए सजता है कैसे फूलों से
कली कली पे लगे जैसे खुसी छाई हो
मचल उठा है इन्हें देख देख मन सबका
हरेक मन मे जैसे ऋतु बसंत आई हो
धरा पे धानी चुनर सज रही नवेली सी
धरा दुल्हन लगे प्रीतम से मिलके आई हो

सरोज यादव

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

1 कविता

View Profile