लता लिपट के जो कानों में कह गयी तरु के
वो झूम यूँ गया जैसे बहार आई हो
खुशी को जिसने भी देखा समझ गया खुद ही
मयूर के लिए जैसे कि घटा छाई हो
जिधर भी देखिए मौसम भी मेहरबान हुआ
चमकते जुगनू की जैसे बरात आई हो
ये बाग़ देखिए सजता है कैसे फूलों से
कली कली पे लगे जैसे खुसी छाई हो
मचल उठा है इन्हें देख देख मन सबका
हरेक मन मे जैसे ऋतु बसंत आई हो
धरा पे धानी चुनर सज रही नवेली सी
धरा दुल्हन लगे प्रीतम से मिलके आई हो
सरोज यादव
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