हे भारत के सभ्य गुनी जन
उठो, जगो, लो अंगड़ाई
कीर्ति पताका फहराने की
अतुलनीय बेला आई
देख रहा है विश्व चकित सा
उठते, बढ़ते भारत को
खोज रहा जग हुआ व्यथित सा
सरल, सुशिक्षित भारत को
प्रखर तेज, श्रम, बल, कौशल से
प्रवर बुद्धि, अभिनव संबल से
भर दो इस अम्बर वितान को
कर्म, धर्म कौशल से
स्थापित है चंद्रयान अब
"इसरो" के बुधि बल से
लहरेगा निर्बाध तिरंगा
निर्मल विधु के तल पे
भारत का यश फैल रहा है
"इसरो" के दल बल से
- संतोष