झूठ के पाँव में पंख लगे हैं
सच के पैरों में उंगलियां भी नहीं
रास्ता है बीहड़ का मुसलसल अँधेरा
साथ है तुम्हारे तितलियाँ भी नहीं |
मत जाओ ,
यहां तक आने में वक्त लगा था
लौट आओ ,
की चलना बहुत है अभी
देखो जरा !
मुल्क़ मंसूख है हमारा
कहने को बस...
ये शहर है तुम्हारा
मत जाओ
की घोषलें गरम है अभी
लौट आओ
अभी तक भोर नहीं हुई
तुम कहां जाओगी ?
इंकलाब से पहले
हम जानते है
तुम्हारा कोई घर नहीं | |
" संतोष यदुवंशी "
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।