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यहां तक आने में

                
                                                         
                            झूठ के पाँव में पंख लगे हैं
                                                                 
                            
सच के पैरों में उंगलियां भी नहीं
रास्ता है बीहड़ का मुसलसल अँधेरा
साथ है तुम्हारे तितलियाँ भी नहीं |

मत जाओ ,
यहां तक आने में वक्त लगा था
लौट आओ ,
की चलना बहुत है अभी
देखो जरा !
मुल्क़ मंसूख है हमारा
कहने को बस...
ये शहर है तुम्हारा
मत जाओ
की घोषलें गरम है अभी
लौट आओ
अभी तक भोर नहीं हुई
तुम कहां जाओगी ?
इंकलाब से पहले
हम जानते है
तुम्हारा कोई घर नहीं | |
" संतोष यदुवंशी "


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6 वर्ष पहले

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