तू कौन है, जो इस काया रूपी पिंजरे में रहता है,
हर रात न जाने तू कहाँ चला जाता है।
हालातों की हल्की-सी आहट होते ही,
तू सिमटकर फिर इसी पिंजरे में लौट आता है।
तेरा रूप कैसा है, तू दिखता कैसा है,
मेरे मन में यह संशय बना रहता है।
तेरे इस अनोखे रहस्य को,
आज तक कौन समझ पाया है?
एक दिन तू हमेशा के लिए चला जाता है,
पीछे यह पिंजरा यूँ ही पड़ा रह जाता है।
जिस काया को अपना समझकर दुनिया जीती है,
वही काया एक दिन मिट्टी में मिल जाती है।
न जाने तू कौन है, कहाँ से आता है,
और इस नश्वर संसार से कहाँ चला जाता है।
तेरे होने से ही इस शरीर की पहचान है,
तेरे बिना तो यह मिट्टी का मकान है।