शब्दों के बाण जहां चलते हैं
लोग वहां मुश्किल से संभलते हैं
अक्षर ही शब्द की जान है
जहां हटे शब्दों के अर्थ बदलते हैं
अंधे का अंधा द्रौपदी ने कह तो दिया
सबने देखा कैसे परिणाम निकलते हैं
जब भी बोलो सोच समझ कर बोलो
वरना चाकू छुरे चलते हैं
इतिहास गवाह है
ये रामायण को भी
महाभारत में बदलते हैं
शब्दों के बाण जहां चलते हैं
लोग वहां मुश्किल से संभलते हैं
मुँह रूपी तरकश से
इन्हें ध्यान से निकालो
वरना शब्दों के बाण की रफ्तार
इतनी तेज होती है
ये निकलते ही लगते हैं
शब्दों के बाण जहां चलते हैं
लोग वहां मुश्किल से संभलते हैं
by Sanser Pal Singh
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