कृष्णा दर्शन
मुखड़ा
कृष्णा दर्शन बस इतना रे,
जैसे भी हो, तुम तो आओ।
अधर रखे मुस्कानें झूठी,
और जगत को मत भटकाओ।।
अंतरा १
माटी का तन, मृण होना है,
काहे इतना मान करे रे।
चार दिवस की साँस उधारी,
काहे जग अभिमान धरे रे।
छोड़ जगत की झूठी माया,
मन-मंदिर में दीप जलाओ।
कृष्णा दर्शन बस इतना रे,
जैसे भी हो, तुम तो आओ।।
अंतरा २
सृष्टि सदा ही जननी तेरी,
इच्छा हरदम पूर्ण करे है।
जिसने तुझको जन्म दिया है,
उससे क्यों तू दूर फिरे है।
माँ की गोद छोड़ रे पगले,
किस आँगन में सुख तुम पाओ?
अधर रखे मुस्कानें झूठी,
और जगत को मत भटकाओ।।
अंतरा ३
कोई तेरे संग कहाँ रे,
फिर क्यों इतना मोह बढ़ाया?
जिसको अपना समझ रहा तू,
वही समय ने दूर भगाया।
एक वही है साथ तुम्हारे,
फिर क्यों उसको भूल जाओ।
कृष्णा दर्शन बस इतना रे,
जैसे भी हो, तुम तो आओ।।
अंतरा ४
बाँसुरी की तान सुनो अब,
मन की सारी पीर मिटाओ।
राधा जैसा प्रेम हृदय में,
मीरा जैसा भाव जगाओ।
छल-प्रपंच सब तज रे पगले,
अपने भीतर कृष्ण बसाओ।
अधर रखे मुस्कानें झूठी,
और जगत को मत भटकाओ।।
अंतरा ५
नहीं चाहिए स्वर्ण-महल रे,
नहीं चाहिए यह भी जहान।
चरण तुम्हारे मिल जाएँ बस,
इतना ही रे रहे अरमान।
यही निराला की पुकार है,
हे श्याम न अब देर लगाओ।
कृष्णा दर्शन बस इतना रे,
जैसे भी हो, तुम तो आओ।।
-संजय निराला