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मेरी जांनिब मत आओ

Sanjay Grover

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिन कमरों को सहता हूं
        
                                                    
                            
उन कमरों में रहता हूं

बाहर अच्छे दिखते हो
मैं अंदर की कहता हूं

तुमको क्यों तक़लीफ़ हुई
तुमसे मैं क्या कहता हूं

सोच मेरी इक दरिया है
बहता हूं तो बहता हूं

मेरी जांनिब मत आओ
ख़ुदग़र्ज़ों से कहता हूं

तुमको जगह बनानी है
मैं बहता हूं, सहता हूं

दिन में मैं हूं एक क़िला
शाम ढले मैं ढहता हूं

दूसरे मन को क्या जानूं
अपने मन की कहता हूं
-संजय ग्रोवर
एक महीने पहले
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