रामायण हो या गीता कुरान,
हो बाइबल या वेद–पुराण
पशु-पक्षी, पादप या नर, हो
विस्तृत नभ या पर्वत, सागर
मेरी अभिलाषा बस इतनी, हैं
नियति नटी में चीजें जितनी
उन सबको पहचान सकूँ, हो
शिक्षित, मैं भी जग की पहचान बनूँ ।
वर्षों से थी मेरी अभिलाषा
पढ़-लिख कर विद्वान बनूँ
छा जाऊँ मैं पूरे जग में, इतना
परम महान बनूँ
पूर्ण हुई अब मनोकामना,
पढ़ना-लिखना सीख गया
क्या सच्चा, क्या झूठा जग में,
सब कुछ मुझको दिख गया ।।