एक गधा था सड़क किनारे,
कई दिनों से मरा पड़ा ।
बदबू फैल रही चहुँ ओर,
यही बताती-है बहुत सड़ा।।
कुछ कौए बैठे थे उसपर,
नोच-नोच कर रहे थे खा ।
एक कौवे ने आँख निकाला,
थे कई रहे अंतड़ियां खा ।।
खोद-खोद कर सड़े मांस को,
चोंच से अपने वे फैलाते ।
खचपच-खचपच कीड़े सारे,
इधर-उधर झर-झर जाते ।।
फैल जाता फिर सड़ा दुर्गंध,
आस-पास चहुँ ओर।
कीड़े पड़े बदन में पूरे,
था बचा न कोई कोर ।।
एक कौए ने नोचा अंतड़ी,
झपटा उसको एक दूजा ।
खाते बड़े चाव से वे,
इससे स्वादिष्ट भला क्या दूजा ?
मत तुम जी ललचाओ भाई!
क्यों भर आया मुँह में पानी ?
ये ‘अबोध’ कौओं का भोजन,
है तुम्हें नहीं खानी ।।