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मरा हुआ गधा

                
                                                         
                            एक गधा था सड़क किनारे,
                                                                 
                            
कई दिनों से मरा पड़ा ।
बदबू फैल रही चहुँ ओर,
यही बताती-है बहुत सड़ा।।

कुछ कौए बैठे थे उसपर,
नोच-नोच कर रहे थे खा ।
एक कौवे ने आँख निकाला,
थे कई रहे अंतड़ियां खा ।।

खोद-खोद कर सड़े मांस को,
चोंच से अपने वे फैलाते ।
खचपच-खचपच कीड़े सारे,
इधर-उधर झर-झर जाते ।।

फैल जाता फिर सड़ा दुर्गंध,
आस-पास चहुँ ओर।
कीड़े पड़े बदन में पूरे,
था बचा न कोई कोर ।।

एक कौए ने नोचा अंतड़ी,
झपटा उसको एक दूजा ।
खाते बड़े चाव से वे,
इससे स्वादिष्ट भला क्या दूजा ?

मत तुम जी ललचाओ भाई!
क्यों भर आया मुँह में पानी ?
ये ‘अबोध’ कौओं का भोजन,
है तुम्हें नहीं खानी ।।
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55 मिनट पहले

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