आओ रे सखियां उड़ायें गुलाल,
मदमस्त फगुनवां आ गइलें।
होली खेलें और मचायें धमाल,
निगोड़ी बदन अंगड़ा गइलें।।
जौ - सरसो - गेहूँ गदरा गइलें,
अमवा की डार बौरा गईलें।
फगुनहटी बयार देह दुखा गइलें,
मन में कसक एक जगा गइलें।।
अब मन में रहे ना कोई मलाल।
मदमस्त फगुनवां आ गइलें।।
–संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’