दादा,दादा क्या पढ़ते हो,
बैठे आप अकेले में ?
पकड़ो हाथ मेरा आओ,
चलते हैं हम मेले में ।।
क्यों कहते हैं पापा ऐसा,
पड़ना नहीं झमेले में ।
दिन-रात आप गड़बड़ करते,
रख दूं क्या तुम्हें तबेले में।।
पर चिंता मत करो आप,
साथ रहूँगा मैं हरदम ।
खाना-पानी मैं दूँगा,
दूर करूँगा सारे ग़म।।
एक दिन ऐसे आप ले गए
होंगे, मेले में पापा को।
पर जब भी आती बात आपकी,
वे क्यों जाते हैं आपा खो?
बेटा! बस कर रहने दे,
वरना पड़ेगी तुझको मार।
बाप तुम्हारा जब जानेगा,
पड़ जाओगे तुम बीमार।।
दादा चिंता छोड़ो आप,
आओ खाते हैं केले ।
रुकना बेटा, थोड़ा सा तूँ ,
पहले थोड़ा दम तो ले लें।।
आओ चरखा झूले दादा,
देखो आए ना चक्कर ।
फिसल जाए ना पाँव कहीं,
चढ़ना थोड़ा सा बचकर ।।
मुझे समझता है तूँ पगले!
जो अब भी नहीं है भूला।
जब भी जाते मेला बचपन में,
थे खूब झूलते झूला।।
गोलगप्पे खाओगे दादा?
पर कैसे? नहीं एक भी दाँत।
चुप बे छोरे ! क्या कहता है?
खाऊंगा दस-पाँच।।
देखो दादा, खास रहे ना!
हो गया सारा मजा बेकार।
दाँत नहीं तो घोंट लिए क्यों?
पड़ जाओ ना कहीं बीमार।।
क्या कहता बेटा बबलू!
अभी घोंट सकता हूं चाट।
पर,पापा से मत कहना,
वरना खाओगे तुम डांट ।।
क्या दादा ? इतना अबोध हूँ!
अब चलो चलें हम घर ।
हाँ बेटा! तुझको पाकर तो,
मैं गया भवसागर तर ।।