आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पड़ जाओ ना कहीं बीमार।।

                
                                                         
                            दादा,दादा क्या पढ़ते हो,
                                                                 
                            
बैठे आप अकेले में ?
पकड़ो हाथ मेरा आओ,
चलते हैं हम मेले में ।।

क्यों कहते हैं पापा ऐसा,
पड़ना नहीं झमेले में ।
दिन-रात आप गड़बड़ करते,
रख दूं क्या तुम्हें तबेले में।।

पर चिंता मत करो आप,
साथ रहूँगा मैं हरदम ।
खाना-पानी मैं दूँगा,
दूर करूँगा सारे ग़म।।

एक दिन ऐसे आप ले गए
होंगे, मेले में पापा को।
पर जब भी आती बात आपकी,
वे क्यों जाते हैं आपा खो?

बेटा! बस कर रहने दे,
वरना पड़ेगी तुझको मार।
बाप तुम्हारा जब जानेगा,
पड़ जाओगे तुम बीमार।।

दादा चिंता छोड़ो आप,
आओ खाते हैं केले ।
रुकना बेटा, थोड़ा सा तूँ ,
पहले थोड़ा दम तो ले लें।।

आओ चरखा झूले दादा,
देखो आए ना चक्कर ।
फिसल जाए ना पाँव कहीं,
चढ़ना थोड़ा सा बचकर ।।

मुझे समझता है तूँ पगले!
जो अब भी नहीं है भूला।
जब भी जाते मेला बचपन में,
थे खूब झूलते झूला।।

गोलगप्पे खाओगे दादा?
पर कैसे? नहीं एक भी दाँत।
चुप बे छोरे ! क्या कहता है?
खाऊंगा दस-पाँच।।

देखो दादा, खास रहे ना!
हो गया सारा मजा बेकार।
दाँत नहीं तो घोंट लिए क्यों?
पड़ जाओ ना कहीं बीमार।।

क्या कहता बेटा बबलू!
अभी घोंट सकता हूं चाट।
पर,पापा से मत कहना,
वरना खाओगे तुम डांट ।।

क्या दादा ? इतना अबोध हूँ!
अब चलो चलें हम घर ।
हाँ बेटा! तुझको पाकर तो,
मैं गया भवसागर तर ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
44 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर