भोर हुआ, मुर्गा बोला,
बहा समीर, तन-मन डोला ।
आसमान ने पहना चोला,
गेरूए रंग का अजब झिंगोला ।
चिड़ियाँ चूँ-चूँ चहक रहीं,
फूल की बगिया महक रही ।
काली कोयल करती कूँ-कूँ,
मुर्गा राजा फिर कुकड़ू-कूँ।।
बहनें लगी सुखद पुरवाई,
सूरज ने ली है अंगड़ाई ।
कलियाँ खुशी से हैं मुसकाईं,
भंवरों ने गुंजार लगाई।।
धरती की छवि हुई रूपहली,
फैली भू पर किरण सुनहली।
बछड़े के संग गाय रंभाई,
तोते ने है पर फैलाई।।
ऐसा सुंदर समय निराला,
फिर-फिर लाना जगदीश।
हम सब बच्चे विनती करते,
और झुकाते अपना शीश।।