औरत घर की शान कहलाती,
सुन लो दुनिया वालों,
घर की लक्ष्मी औरत ही है,
रूठ जाए तो इसे मान लो।
करो ना इस पर अत्याचार,
बुरी भावना तुम ना पालो,
जननी धारणी भरनी हैं ये,
घर से तुम ना इन्हें निकालो।
कहीं बहक जाए यदि यह तो,
फौरन इन्हें संभालो
गिरे कहीं यदि ठोकर खाकर
तो–फौरन इन्हें उठा लो ।
भूल हुई इनसे यदि कोई,
गलती पर पर्दा डालो
कोमल, नाजुक, निर्मल है ये,
फिर-फिर इन्हें संभालो।।
– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’