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पुलवामा हमला

sangita kulkarni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्मीद से नहाके निकले थे कभी घर से,
        
                                                    
                            
तिरंगे की शान ओढे लौटे दर पे फिर से,
चांद सितारों पर काबू पाते थे नौजवान,
करोडों भारतीयों का थे बस वहीं गुमान!
वर्दी में ऐसे जजते जैसे की हिमालय पहना,
देशभक्ती ही उनका सबसे अनमोल गहना,
निकले थे पहुंचने कहीं मंजिल पे थी उनकी नजर,
निकलना पडा लेकिन कहीं खौफनाक था वो मंजर!
इक सरफिलें देश की साजीश लाशें बिछा गई,
धरती मां का सीना लहू से लालेलाल कर गई,
बूजदिल थे वो ना सीखी आमनेसामने की लडाई,
वरना भूला देते हम उनको उनकी ही सारी खुदाई !
वैसे तो है खिलाफ है जंग के जबाब देना जानते है,
कुरघोडी करनेवालो को राह दिखाना जानते है,
पुलवामा के जबाब से दुनिया ने जो सीख ली,
भूली बिसरों ने भी अलग हमसे राह ढूंढ ली !
 
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