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न दर्पण का टुकड़ा, न कागज़ की राखी है।

Sandhya tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हार-जीत का निर्णय करते,
        
                                                    
                            
मैं खुद से ही टकराई,
कालचक्र के घूमते पहिए में,
हर राह धुंधली नज़र आई।
समय ने ऐसा खेल रचाया,
सबने अपना रूप भुलाया,
जब ज़रूरत थी अपनों की,
वे दूर खड़े मुस्कुराए।
वक्त के फेर ने रंग दिखाया,
जिससे डरती थी, सामने आया,
बदल गए वे रिश्ते सारे,
जिन्हें अपना समझा था मैंने।
पर हार नहीं अब मानूँगी,
हर पीड़ा से लड़ती जाऊँगी,
हौसलों की लौ हृदय में धरकर,
नई सुबह को गले लगाऊँगी।
खुले गगन में उड़ते पंछी,
आशाओं का संदेश सुनाते,
नित नए सपनों के दीप जलाकर,
मेरे अरमानों को राह दिखाते।
न समझो मुझे हुस्न की मलिका,
न पत्थर की कोई मूरत,
सादगी में शक्ति समेटे,
मैं खुद लिखती अपनी सूरत।
आत्मविश्वास को साथ लिए,
हर बाधा से टकराती जाऊँ,
वक्त-बेवक्त, अनवरत चलते,
अपने शिखर तक बढ़ती जाऊँ।
रूठे परिंदे लौट ही आते,
शाम ढले अपने घर को,
मैं भी लौटूँगी अपने सपनों तक,
जीतकर हर भय, हर डर को।
न समझो मुझे नादान परिंदा,
मेरे पंखों में उड़ान अभी बाकी है,
ये दिल है मेरा—धड़कता आकाश,
न दर्पण का टुकड़ा, न कागज़ की राखी है।
5 घंटे पहले
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Ramesh Raj

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