तरु की पीड़ा तरू से पूछो
क्या है उसके मन का दर्द
अपनी छाया देकर जग को
खुद सहता है कितने मर्म
झुकी डलियां देती आशीष
फूलों से महकता संसार
तरु का दर्द समझे बस माली
कौन सुन उसकी चित्कार
फूलों की इच्छा किसने पूछी
किसने समझी उनकी वेदना
दुनिया बस चाहे खुशबू
कौन सुने उनकी संवेदना
रुई की बत्ती दिए में
तेल सहारा बनता
जलकर दीप करे उजियारा
दीपक का दर्द न समझे दुनिया
दिवाली मनाए जग सारा
खुद को जलाकर बाटते रोशनी
उनकी पीड़ा कौन समझता
दुनिया तो उत्सव मनायें
पर भीतर कितना कौन है जलता