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वृद्धावस्था की अनुभूति

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डरते हो मेरी नजरों के करीब आने से
        
                                                    
                            
बचते हो तुमसे कहीं मदद ना मांग लूं
झिझकते हो काया के समीप आने से
सोचते हो हाथों का सहारा ना मांग लूं
भागते हो पास आकर कुछ बात करने से
डर है तुम्हारा कीमती समय न गवा दूं
चिढ़ जाते हो जब भी कोई सलाह देता हूं
कह देते हो मेरी सोच पुरानी है ना कहूं
रखते हो मुझे अलग किनारे के कमरे में
कहते हो भीड़ से अलग स्थान है मेरा
पर प्राण प्रिए भूलो मत इस तथ्य को
जहां मैं हूं आज कल वहीँ स्थान है तेरा
तुमको रखा सदा नजरों के पास ही
दिल के टुकड़े हो कोई चोट ना लगे
तन-मन मेरा तेरे ही साथ था सदा
ताकि तुम्हें कभी कोई ओट ना लगे
सहारा देकर चलना तुम्हें सिखाया
अपनी रोशनी में बदलना सिखाया
बातों से साथ दे कंधे पर हाथ दे
तेरे हर पल को कीमती समय बनाया
मेरा विचार है पुरानातुमको नहीं भाता
संतान को पुराने लगते हैं पिता माता
वही लोग करते मुझे भीड़ से अलग
जिनका मुझसे ही आगाज हुआ है
अपने हैं देते दिल पर भार दर्द का
वाहे गुरु बता ये कैसी बद्दुआ है
-कुँवर संदीप सिंह
3 महीने पहले
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