आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वृद्धावस्था की अनुभूति

                
                                                         
                            डरते हो मेरी नजरों के करीब आने से
                                                                 
                            
बचते हो तुमसे कहीं मदद ना मांग लूं
झिझकते हो काया के समीप आने से
सोचते हो हाथों का सहारा ना मांग लूं
भागते हो पास आकर कुछ बात करने से
डर है तुम्हारा कीमती समय न गवा दूं
चिढ़ जाते हो जब भी कोई सलाह देता हूं
कह देते हो मेरी सोच पुरानी है ना कहूं
रखते हो मुझे अलग किनारे के कमरे में
कहते हो भीड़ से अलग स्थान है मेरा
पर प्राण प्रिए भूलो मत इस तथ्य को
जहां मैं हूं आज कल वहीँ स्थान है तेरा
तुमको रखा सदा नजरों के पास ही
दिल के टुकड़े हो कोई चोट ना लगे
तन-मन मेरा तेरे ही साथ था सदा
ताकि तुम्हें कभी कोई ओट ना लगे
सहारा देकर चलना तुम्हें सिखाया
अपनी रोशनी में बदलना सिखाया
बातों से साथ दे कंधे पर हाथ दे
तेरे हर पल को कीमती समय बनाया
मेरा विचार है पुरानातुमको नहीं भाता
संतान को पुराने लगते हैं पिता माता
वही लोग करते मुझे भीड़ से अलग
जिनका मुझसे ही आगाज हुआ है
अपने हैं देते दिल पर भार दर्द का
वाहे गुरु बता ये कैसी बद्दुआ है
-कुँवर संदीप सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर