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पककर धूमिल हुए सफेद दिखें बाल

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पककर धूमिल हुए सफेद दिखें बाल
        
                                                    
                            
कपोलों के भीतर धँस गया है गाल
माथे की सिलवटें बनती है झुर्रियां
समापन से करीबी जीवन से दूरियां
रेखा चित्र अस्थियों का हो रहा प्रत्यक्ष
ऊर्ध्वाधर पुरानी काया बन गई है अक्ष
कंपकंपाता कदम मुश्किल से बढ़े आगे
जब सोती है दुनिया हम चिंता में जागे
सुनता ही नहीं कोई अनुभवों को जबानी
पीढ़ी के अंतर में हुई हर बात ही बेमानी
अपने ही बसेरे में हम बन गए मेहमान
मेरी उपज बनाती मेरे विदाई का प्लान
वृद्धाश्रम भेजोगे सुनियोजित हो आप
रुको चंद पल और सोचो मेरे बाप
शांत कर लो मन रोक लो हलचल
जो है मेरा आज वही होगा तेरा कल
मत फेंक पाठ में कांटे जो चुभें तुझको कल
सजा भविष्य अपना हमें भी साथ लेके चल
प्यार दे उनको भी जो हैं तेरे स्रोत
जीवन से लें विदाई हो खुशियों से ओत-प्रोत
जब जन्म पर किसी के मना सकते हो बधाई
क्यों नहीं खुशी से दे सकते हो विदाई
-कुँवर संदीप सिंह
3 महीने पहले
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