कुछ की नहीं अधिकांश की
छूटती जा रहीं हैं आदतें
पढ़ने की पुस्तकें
और बढ़ती ही जा रही है
कुछ की नहीं अधिकांश की
आगे बढ़ने की ख्वाहिशें
कैसे होंगी दोनों बातें एक साथ
स्नेह ही देता दीपक को लौ
पुस्तकें जरूर पढ़ें
-संदीप सिंह कुँवर