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माँ-भगवान का स्वरूप

Sanchita Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहते हैं ईश्वर के अनेक रुप है,
        
                                                    
                            
सच ही तो कहा है,
माँ भी उन्हीं का एक स्वरुप है।
भगवान से ऊंचा है जिसका कद,
खुद से ऊपर रखा है भगवान में उसका पद।
जिसका उतार नहीं सकते हैं हम कर्ज जीवन भर,
जिसका दर्जा है सबसे ऊपर।
उसी से चलता है यह जहां,
सोच भी नहीं सकते उसके बिना कैसे हम कहां।
भरी है जिसमें अपार ममता,
अपरिभाषित है उसकी क्षमता।
निस्वार्थ भाव से भरी है जो,
प्रेम की सागर से गहरी है वो।
ममता की है वह मूरत,
देवी की है वह सूरत,
ईश्वर का दर्जा है जिसके बाद,
उन्हें का दिया हुआ है यह आशीर्वाद ,
स्वार्थी है यह जहां ,
बस उसमें माँ है एक अपवाद।
समझा जिसने माँ को पा लिया उसने भगवान,
विश्व रचयिता सर्वशक्तिमान की धरती पर वही है पहचान।
उसके चरणों में बसता है स्वर्ग ,
वह नहीं किसी एक की
उसको पूजता है सारा वर्ग।
उस ने सिखाया दुनिया का करना सामना,
भरी है उसमें प्रेम की असीम भावना।
भगवान ने भेजा जिसको अपनी कमी भरने के लिए,
उसने बखूबी निभाया इस को,
फिर कभी आना ना पड़ा उन्हें दुख क्लेशों को हरने के लिए।
सर्वशक्तिमान ईश्वर ने हम सबको दिया है अनमोल वरदान,
माँ की पूजा करो,
तुम्हें मिल जाएंगे भगवान।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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