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सब रह गया यूँहीं।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहाँ कुछ आँख में अब मेरी सब बह गया यूँहीं।।
        
                                                    
                            
रखा था जो बचाकर बाद को सब रह गया यूँहीं।।
समंदर से शिकायत है मेरी ना दरिया से हैं कोई,,
वो जो ख़ामोश बहता था के सब कह गया यूँहीं।।
कभी जो मुझ पे मरते थे कहां अब जिंदगी में है,,
वफ़ाओं के सफ़र में मैं आज तन्हा रह गया यूँहीं।।
कहां किससे कहें अपनी कोई सुनता नहीं अपनी,,
शिकायत लाख दिल में है मगर सब सह गया यूँहीं।
कहां अब रोज़ होती हैं मेरी मोहब्बत से वो बातें,,
कभी जो वक़्त मेरा था गुज़र कर रह गया यूँहीं।।
वही अपना हैं दुनियाँ में जिसे देखा नहीं हमनें,,
फ़क़ीर इक राह का यारों मुझसे कह गया यूँहीं।।
चलो अच्छा हुआ के मिट गई सब दूरियाँ भी देव,,
लहद में आए सज धजकर के सब रह गया यूँहीं।।
-सुनील देव
एक घंटा पहले
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