ख़्वाहिशों की भीड़ में ज़ख़्म दबकर रह गए।।
जो कभी वादें किए थे नज़्म बनकर रह गए।।
क्या करेंगे फूल से अब इश्क़ का इज़हार हम,,
ज़िंदगी में दर्द ही जब हुक्म बनकर रह गए।।
कौन किसका है यहाँ सब के सब है मतलबी,,
आज हम टूटे दिलों के इल्म बनकर रह गए।।
अब जलाओ या बुझाओ फेंक दो बाहर कहीं,,
एक जिंदा लाश के बे-'अज़्म बनकर रह गए।।
आईने से क्या शिकायत कैसी सूरत हो गई,,
हमने देखा है यहाँ सब कज़्म बनकर रह गए।।
दूर से कितना भी चाहो पर पास में जाना नहीं,,
जो भी उसे छू लिया जिस्म जलकर रह गए।।
दोस्ती के नाम पर देव दुश्मनी करते हैं लोग,,
हाथ से ही हाथ यां सब कल्म बनकर रह गए।।
-सुनील देव