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मेरी कोई उम्मीद नहीं।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सबको मुझसे उम्मीदें पर मेरी कोई उम्मीद नहीं।।
        
                                                    
                            
सब जीते यां मुझसे लेकिन मेरी कोई जीत नहीं।।
झूठ कहूँ तो तौबा मेरी सच बोलूँ तो मैं मर जाऊँ,
सबके किस्से प्यार बने पर मेरी कोई रीत नहीं।।
हर चेहरे पर जान ना देना यां चाहे तन्हा रह लेना,,
हर चेहरे में इक चेहरा है पर मेरी कोई दीद नहीं।।
झूठो की दुनियाँ में यारों सच्चो का अब दाम नहीं,,
हाथ रखूँ तो सब कुछ मेरा मेरी कोई चीज़ नहीं।।
सबको अपनी पड़ी यहाँ पे कौन किसी को देखे है,
मेरी बातें अच्छी लगती पर मेरी कोई तनक़ीद नहीं
दो अंगुल का मुँह है लेकिन बात करे लंबी चौड़ी,,
आदत तो अच्छी लगती पर मेरी कोई मीत नहीं।।
रोने को तो रो लेते पर कोई सुने ना अब देखे देव,,
यादों की दुनियाँ अच्छी पर मेरी कोई चीज़ नहीं।।
-सुनील देव
6 घंटे पहले
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