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गर ख़्वाहिश ना होती तो कब का मर गया होता।।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गर ख़्वाहिश ना होती तो कब का मर गया होता।।
        
                                                    
                            
ना यूँ फिरता आवारा सा कब का घर गया होता।।
सुना था ज़िंदगी में शब ए चाँद का होना ज़रूरी है,
अगर हिस्से में ना आता तो कब का डर गया होता
मेरे बारे में जो सोचो मगर हक़ीकत तो यही है बस,
तेरा गर हाथ ना होता तो कब का गिर गया होता।।
कोई हमसे ना अब पूछो के ये कैसे हुआ है घाव,,
लकीरों में जो दम होता तो कब का भर गया होता
कोई इल्ज़ाम ना दे अब के क्यूँ बाक़ी पड़ा है काम
अगर कोई साथ देता तो कब का कर गया होता।।
बुलाए बिन बुलाए ग़र कभी मिलने को आते तुम,,
ना खाली आज दिल होता कब का भर गया होता।
ना दुनियाँ किसी की है ना यहाँ के लोग अपने देव,
सभी अपने अगर होते तो दिल का डर गया होता।
-सुनील देव
एक दिन पहले
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