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चलो अच्छा हुआ के मर गए जी कर भी क्या करते।।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो अच्छा हुआ के मर गए जी कर भी क्या करते।।
        
                                                    
                            
के जब नशा ही नहीं मय में तो पी कर भी क्या करते।।
वो ख़लिश वो तिश्नगी भी अब हमें क्या याद आएगी,,
गर दरिया लबालब दिल में तो रो कर भी क्या करते।।
किसी की चाह में जां से भी अपनी जब हाथ धो आए,,
बुरे इस हाल में इन चाको को सी कर भी क्या करते।।
जवानी डूब गई जब सारी ही चंद आंखों के कतरों में,,
किसी को कहें यारों के और कह कर भी क्या करते।।
वज़ह तो कुछ नहीं थी जीने की पर चलती रही साँसें,,
ख़ता अपनी ही कुछ होगी हम दीगर भी क्या करते।।
यहाँ हर आँख में इक आँख थी जो पढ़ती रही आँखें,,
उन्हें मालूम था सब कुछ तो बाज़ीगर भी क्या करते।।
उनसे दिल लगाकर देव बदन के इतने हो गए टुकड़े,,
जब मुमकिन नहीं है कुछ तो कारीगर भी क्या करते।।
-सुनील देव
22 घंटे पहले
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