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ज़िंदगी में ग़म की बस हवाएं चलती रह गई।।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी में ग़म की बस हवाएं चलती रह गई।।
        
                                                    
                            
याद के बिस्तर पे कुछ चिताएं जलती रह गई।।

वो शमां वो दौर ए उल्फ़त वो हाथ तेरा हाथ में,,
कहाँ गए वो रात दिन चिंताएं करती रह गई।।

कैसे गुज़ारा होगा अब ये सोचके चुप हो गया,,
आँख भी अश्क़ों से बस वफ़ाएंं करती रह गई।।

कोई अपना ही नहीं या कोई अपना था नहीं,,
सोचते ही सोचते बस कथाएं बनती रह गई।।

मुझसे अपनी ज़िंदगी का वास्ता कुछ यूँ रहा,,
जीते जी बस हाथ पर दवाएँ रखती रह गई।।

चार हर्फ़ों में कहाँ बयां कर पाए अपने दर्द को,,
जब तलक माँ साथ थी बलाएं चुनती रह गई।।

मौत जब लेने को आयी बस चले गए साथ देव,,
वो ना जाने किसके लिए नवाएँ करती रह गई।।
-सुनील देव
एक महीने पहले
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