दिल की अपनी बात गुरेज़ाँ कह पाया है।।
कौन किसी का यहाँ हमेशा रह पाया है।।
आंखों के इस दरिया में कोई रहता है क्या,,
धुंधली आंखों से रस्ता क्या दिख पाया है।।
तुझ पे भी इल्ज़ाम लगाया रात किसी ने,,
बुरा ना मानो सब कर्मों का हम साया है।।
अपने कोई साथ नहीं तो क्या रोना अब,,
तू ही बता के क्या कोई यां बच पाया है।।
मुट्ठी भर की जां और उस पर ऐसी तन्हाई,,
अपने दिल की क्या कोई यां कर पाया है।।
सबकी छोड़ो तुम भी अपनी सोचो यारों,
बिना चले भी क्या कोई यां चल पाया है।।
ग़म पर ऐसी इक ग़ज़ल लिखी है मैने देव,,
अब तक अपना दिल जो ना कह पाया है।।
-सुनील देव