आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हमेशा रह पाया है।

                
                                                         
                            दिल की अपनी बात गुरेज़ाँ कह पाया है।।
                                                                 
                            
कौन किसी का यहाँ हमेशा रह पाया है।।
आंखों के इस दरिया में कोई रहता है क्या,,
धुंधली आंखों से रस्ता क्या दिख पाया है।।
तुझ पे भी इल्ज़ाम लगाया रात किसी ने,,
बुरा ना मानो सब कर्मों का हम साया है।।
अपने कोई साथ नहीं तो क्या रोना अब,,
तू ही बता के क्या कोई यां बच पाया है।।
मुट्ठी भर की जां और उस पर ऐसी तन्हाई,,
अपने दिल की क्या कोई यां कर पाया है।।
सबकी छोड़ो तुम भी अपनी सोचो यारों,
बिना चले भी क्या कोई यां चल पाया है।।
ग़म पर ऐसी इक ग़ज़ल लिखी है मैने देव,,
अब तक अपना दिल जो ना कह पाया है।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर