विज्ञापन

कितनी जहां में भीड़ है लेकिन फिर भी लगता तन्हा हूँ।।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कितनी जहां में भीड़ है लेकिन फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
        
                                                    
                            
दर्द ओ ग़म है घेरे दिल को पर फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
रात रात भर जाग जाग कर करता है दिल खुद से बातें,,
धड़कन का तो शोर बहुत मगर फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
क्या जाने कब आए क़ज़ा बस इसलिए ही चुप बैठा हूं,,
कानों में घंटी सी बजती लेकिन फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
तेरी मेरी बात नहीं ये यहां हर इक शख़्स का किस्सा है,,
सुनता है दिल रोज़ ये सब की फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
मुझको मिलने आती हैं वो रोज़ सुबह सूरज के साथ,,
मिल कर मुझसे बैठी रहती पर फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
ख़ामोशी की ओढ़के चादर खुद से करती रहती हैं बातें,,
दिल को भी अच्छी लगती हैं पर फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
थक जाता हूँ जब भी मैं बस याद उसे कर लेता हूं देव,,
याद करूं तो लगती हैं अपनी फिर भी लगता तन्हा हूँ।।
-सुनील देव
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile