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खड़ा चौखट पे मै जब भी देखता हूं डूबता सूरज

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं अपने आप को जब बेचकर बाज़ार से निकला।
        
                                                    
                            
महंगी हो गई हर इक शय जब कर्ज़दार से निकला।।

लकीर हाथ में मेरे इक जीत की बाकी थी लेकिन
चाहता जीत सकता था मगर मै हार के निकला।।

खड़ा चौखट पे मै जब भी देखता हूं डूबता सूरज,,
के लाल रह गई आँखें जब ग़म गुसार से निकला।।

दीवाना मुझको कह दो या कोई भी नाम दे दो अब
मैं वो दरवाज़ा हूँ ज़ालिम जो तेरी दीवार से निकला।

आज दैर ओ हरम देखा है वो जो दिल में रहता था
अब क्या बताएं तुमको के क्या तलवार से निकला।

अब क्या कर्ज़ उतरेगा ये तो बढ़ता हैं शब ओ रोज़
मसक्कत छोड़ दी तो दिल बादाख्वार से निकला।।

अब इस ज़िंदगी में तू मुखातिब हो या ना होना देव
मगर जो पढ़ रहा है ग़म इक कलमकार से निकला।।
-सुनील देव
एक महीने पहले
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