विज्ञापन

अच्छा लिखते हो बाबुल को आँख के आगे रख कर तुम।।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अच्छा लिखते हो बाबुल को आँख के आगे रख कर तुम।।
        
                                                    
                            
पढ़ते पढ़ते दर्द जगा कर कर जाते हो बस आँख को नम।।
किस्सा तो हर घर का यही हैं के हर बूढ़ी आँख में पानी है,,
किसी के आगे रोई नहीं पर भर आती क्यूँ ये आँख सनम।।
माँ का हाल सुने हर कोई मगर बाप का दर्द ना जाने कोई,,
आँख में मंज़िल सोच के वो जो चलता रहता चार कदम।।
लाचारी का आलम हो या ग़म से घिरी हो चाहे भीगी शाम,,
बोझ उठाए जिम्मेदारी का बस वो मरता रहता हैं हर दम।।
दुनियाँदारी से लड़कर दिन भर आता हैं जब शाम को घर,,
हँस लेता है देख सभी को बस भूल के अपने सारे ग़म।।
अपनो की खुशियों के आगे शायद भूल गया है जीना वो,,
उसकी भी तो ख़्वाहिश होगी कुछ उसका भी तो होगा ग़म।।
सारी उम्र निकल गई यूँहीं यही सोचके उसकी अपनी देव,,
पगड़ी ना खुल जाए कहीं बस गिनता रहा माह ए शब नम।।
-सुनील देव
6 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Deepak Narang

295 कविताएं

View Profile

Aalam-e-Ghazal Parvez

285 कविताएं

View Profile