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कुछ अधूरी व्यथाएँ स्मृतियों में बसी रह गईं।

Samay Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उत्कंठा भरे मन में अनुनय लिए,
        
                                                    
                            
मेरे जीवन की तृष्णा तो तुम हो प्रिये।
इस व्यथा की कथा मैं कहूँ और किससे,
मेरा पाना और खोना भी तुम हो प्रिये।

मेरी पीड़ा वो नहीं जो तू मुझे न मिली,
मैं तो नियति से हूँ चोट खाया हुआ।
राब्ता लोगों ने मुझसे यूँ कर लिया,
मैं तो मोहब्बत से हूँ मार खाया हुआ।

कुछ अभिलाषाएँ अंतस में दबी रह गईं,
कुछ स्मृतियाँ अश्रुओं में बही रह गईं।
जिसे अपना समझकर सँवारा था मैंने,
वही कहानी अधूरी अनकही रह गई।

अब न कोई अनुनय, न कोई शिकायत रही,
न मिलने की उत्कंठा, न कोई चाहत रही।
कुछ अनकही बातें अंतस में दबी रह गईं,
कुछ अधूरी व्यथाएँ स्मृतियों में बसी रह गईं।
22 घंटे पहले
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