इस महकते सावन में
क्या उत्सव मनाए हम
सोचते है कुछ असहायों का
केरल में हाथ बटाए हम
माना कि सावना मनमोहक
हरदम ही रहता है
पर आज कल ये मेरे मन को
सदा ही विकल करता है
कैसे अभी बहक जाऊं मैं
सावन की नशीली रातो में
जबकि मेरे भाई बहन कुछ
केरल के रो रहे हैं रातो में
क्या कारण हो सकता है
ऐसे घटना चक्रों का
ये सीधा परिणाम है
अमानवीय कुचक्रो का
रब की दुहाई देते है
पेड़ खुद ही काट लेते है
क्या करेंगे रब इसमें
जब हम अपने ही संहारक हो
अपनी ही मानवता के
खुद ही हृदय विदारक हो
तो आइए एक मुहिम चलाये
विन्न विन्न पेड़ लगाए
अपनी प्यारी धरती माँ को
वृक्षो से हरा भरा बनाए
बाढ़, ओला, सूखा,भूकंप
इन सबों का नामोनिशान मिटाए
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