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मसीहा, लम्स-ए-इलाही से हो राहत जैसे

Saleem Javed

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल में उतरा है कोई ख़्वाब की सूरत जैसे
        
                                                    
                            
छू गया दिल को किसी शाम की रग़बत जैसे
तेरी आँखों में छुपी है मेरी दुनिया सारी
तुझसे मंसूब है अब ख़्वाब की रंगत जैसे
हम ने देखा जो तुझे, वक़्त ये ठहर सा गया
थम गई हो  हर एक लम्हे की हरकत जैसे
लब पे आया है तेरा नाम तो दिल झूम उठा
लब पे उतरी हो कोई नज़्मये मोहब्बत जैसे
तेरे आने से मेरी ज़ीस्त मुकम्मल सी हुई
मुझ पे नाज़िल हो कोई ग़ैब से बरकत जैसे
एक हसरत ही तो मेहमाँ थी मेरे सीने में
अब वो हसरत ही बनी वजहे-मसर्रत जैसे
तेरे हँसने से बदल जाता है मौसम दिल का
दिले-बेताब को मिली कोई राहत जैसे
रास्तबाज़ी की गवाही है तेरा अक्स-ए-वजूद
रब ने ढाली है तेरे नूर से ख़ल्क़त जैसे
मौज-ए-तूफ़ाँ में घिरा दिल-ए-मुज़्तरिब  मेरा
तेरे साहिल पे मिली इसको आफ़ियत जैसे
दर्द मिट जाता है बस तेरे इक छू लेने से
मसीहा, लम्स-ए-इलाही से हो राहत जैसे

 
2 घंटे पहले
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