आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मसीहा, लम्स-ए-इलाही से हो राहत जैसे

                
                                                         
                            दिल में उतरा है कोई ख़्वाब की सूरत जैसे
                                                                 
                            
छू गया दिल को किसी शाम की रग़बत जैसे
तेरी आँखों में छुपी है मेरी दुनिया सारी
तुझसे मंसूब है अब ख़्वाब की रंगत जैसे
हम ने देखा जो तुझे, वक़्त ये ठहर सा गया
थम गई हो  हर एक लम्हे की हरकत जैसे
लब पे आया है तेरा नाम तो दिल झूम उठा
लब पे उतरी हो कोई नज़्मये मोहब्बत जैसे
तेरे आने से मेरी ज़ीस्त मुकम्मल सी हुई
मुझ पे नाज़िल हो कोई ग़ैब से बरकत जैसे
एक हसरत ही तो मेहमाँ थी मेरे सीने में
अब वो हसरत ही बनी वजहे-मसर्रत जैसे
तेरे हँसने से बदल जाता है मौसम दिल का
दिले-बेताब को मिली कोई राहत जैसे
रास्तबाज़ी की गवाही है तेरा अक्स-ए-वजूद
रब ने ढाली है तेरे नूर से ख़ल्क़त जैसे
मौज-ए-तूफ़ाँ में घिरा दिल-ए-मुज़्तरिब  मेरा
तेरे साहिल पे मिली इसको आफ़ियत जैसे
दर्द मिट जाता है बस तेरे इक छू लेने से
मसीहा, लम्स-ए-इलाही से हो राहत जैसे

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर