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क्योंकि लोकतंत्र में आखिरकार, जन-जन की ही होती सरकार है

संजय एम

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी व्यवस्था पर है प्रश्न उठाते,
        
                                                    
                            
कभी संविधान की बात सुनाते।
लेकिन जब "अवसर" मिलता है,
वे तभी वादों को भूल भी जाते।

अब सत्ता पक्ष को भी ध्यान रहे,
अहंकार की कोई सीमा होती है।
जनता जब कभी करवट लेती है,
तब हरेक कुर्सी हिलती रहती है।

लोकतंत्र केवल एक "नारा" नहीं,
ये जनता का परम् अधिकार है।
वह सत्ताधारी हो या विपक्ष यहाँ,
इन सभी का एक ही आधार है।

रोटी जले तो तुरंत "आँच" बदलो,
नहीं है चूल्हा बदलने की जरूरत।
भोली-भाली जनता को सपने नहीं,
काम व विकास दिखाओ झटपट।

क्योंकि लोकतंत्र में आखिरकार,
जन-जन की ही होती सरकार है,
कुर्सी आती-जाती रहती हरबार,
यहाँ जनता ही असली दरबार है!
-संजय एम तराणेकर
 
22 घंटे पहले
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