एक कमरा, एक ही कपड़ा मिलता है
जब एक लड़का बेरोजगारी में पड़ता है।
अपने ही उस पर हँसते हैं
जब एक लड़का बेरोजगारी में पड़ता है।
अपने ही अपनों से बिछड़ते हैं
जब बेरोजगारी का आलम चलता है।
उसका कमरा और उसके सपने
सपनों में ही खो जाते हैं,
जब एक लड़का बेरोजगारी के दौर से गुजरता है।
सपनों की चादर ओढ़कर
एक लड़का जब शहर में पढ़ने आता है,
बेरोजगारी के आलम में
ऐसे खो जाता है।
उसका सपना कमरों की चारदीवारी में खो जाता है,
सोच- सोच कर अपने सपनों को
बिस्तर पर आँसू की तरह बहाता है,
जब एक लड़का बेरोजगारी से घिर जाता है।
घर-परिवार और समाज के तानों से
वह रोज गुजरता है,
जब एक लड़का बेरोजगारी से गुजरता है,
जब एक लड़का बेरोजगारी से गुजरता है।