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ये कहानी बेरोजगारी की

Sachin yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक कमरा, एक ही कपड़ा मिलता है
        
                                                    
                            
‎जब एक लड़का बेरोजगारी में पड़ता है।

‎अपने ही उस पर हँसते हैं
‎जब एक लड़का बेरोजगारी में पड़ता है।
‎अपने ही अपनों से बिछड़ते हैं
‎जब बेरोजगारी का आलम चलता है।

‎उसका कमरा और उसके सपने
‎सपनों में ही खो जाते हैं,
‎जब एक लड़का बेरोजगारी के दौर से गुजरता है।

‎सपनों की चादर ओढ़कर
‎एक लड़का जब शहर में पढ़ने आता है,
‎बेरोजगारी के आलम में
‎ऐसे खो जाता है।

‎उसका सपना कमरों की चारदीवारी में खो जाता है,
‎सोच- सोच कर अपने सपनों को
‎बिस्तर पर आँसू की तरह बहाता है,
‎जब एक लड़का बेरोजगारी से घिर जाता है।

‎घर-परिवार और समाज के तानों से
‎वह रोज गुजरता है,
‎जब एक लड़का बेरोजगारी से गुजरता है,
‎जब एक लड़का बेरोजगारी से गुजरता है।
‎ 



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