लगातार जिए जा रहा हूं
कई जुर्म किए जा रहा हूं
इसने दी उसने दी सबने दी
बद्दुआएं लिए जा रहा हूं
एक ही तो ख्वाहिश थी
वह भी पिए जा रहा हूं
बोझ समझकर जो रखना ही पड़ा
वो दान में दिए जा रहा हूं
सजा होनी है तय है
कटघरे सजाए जा रहा हूं
सज चुकी है ये अंधेरी कोठरी भी
श्रृंगार बनाएं जा रहा हूं
मुझे उम्मीद है कोई रोकेगा
क्या हुआ किस लिए जा रहा हूं
खुली हवा में है सांस लेना मुश्किल
वहां मैं इसलिए आ रहा हूं
-सचिन निगम