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गाँव की बारिश...

Sachin Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस बार मेरे गाँव में बारिश हो
        
                                                    
                            
तो कुछ ऐसे हो
कि पानी सड़को पर तो गिरे
मगर लोगो की छतों पर नही
क्योंकि यहाँ लोगों के घरों की छतें
पुरानी और जर्जर है
बनी है घास , फूस या मिट्टी की
वो ये बरसात सह न पाएँगी
ज्यादा पानी गिरा तोे बैठ जाएंगी
सड़को पर गिरा पानी
डुबा दे उसे दो अंगुल तक
ताकि दौड़ सके खुशी से
किसानों,मजदूरों के
छोटे ,साँवले ,हँसते बच्चे
और दौड़ा सके
अपनी कागज की नाव
ये पानी भरे बादल
मस्ती में घूमते हुए जब
किसानों के खेतों तक पहुँचे
तो फिर टूटकर बरसे
इतना टूटकर कि
नहा जाए सारी जमीन
लहरा उठे फसलें सोने की तरह
जिससे किसानों की आमदनी
अच्छी हो, इतनी अच्छी कि
किसानों को फिर कर्ज न लेना पड़े
न ही गिड़गिड़ाना पड़े बैंको के आगे
मुँह न ताके कोई सरकार का
कर्जमाफी के लिए
और न ही कोई सड़को पर उतरे
अपने परिवार के लिए
और न ही इस बार
कोई लटके पेड़ से
जैसे पिछली बार लटके थे
घीसू,माधव, मुरारी ,बैजू
और हजारों उम्मीदें।

-सचिन गुप्ता

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8 वर्ष पहले
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